पिछले कुछ सालों में भारत ने डिजिटल दुनिया में तेज़ रफ्तार पकड़ी है।
4G से 5G, UPI से लेकर ऑनलाइन सरकारी सेवाएँ — सब कुछ आम लोगों की पहुँच में आ गया है।
लेकिन इस सुविधा के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है:
क्या हमारी ऑनलाइन प्राइवसी उतनी ही सुरक्षित है जितनी होनी चाहिए?
जवाब सीधा है — नहीं।
जैसे-जैसे हमारी ज़िंदगी ऑनलाइन होती गई,
वैसे-वैसे हमारी निजी जानकारी भी लगातार जोखिम में आती गई।
हर ऐप, हर वेबसाइट, हर फॉर्म के साथ
हम अनजाने में अपनी प्राइवसी का एक हिस्सा सौंपते चले जाते हैं।
समस्या यह नहीं है कि तकनीक आई।
समस्या यह है कि उसके साथ सुरक्षा और जागरूकता उसी गति से नहीं आई।
जब हम ऑनलाइन होते हैं, तब सिर्फ़ मोबाइल या इंटरनेट इस्तेमाल नहीं कर रहे होते,
हम अपनी तस्वीरें, नाम, नंबर, लोकेशन, आदतें
और कभी-कभी बैंक से जुड़ी जानकारी भी साझा कर रहे होते हैं।
ऑनलाइन प्राइवसी कमजोर होने के कुछ सीधे खतरे हैं:
- निजी तस्वीरों और डेटा का लीक होना
- ईमेल, मोबाइल नंबर और नाम का बिना अनुमति बेचा जाना
- परिवार के सदस्यों तक की स्टॉकिंग
- सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए ठगी
- लगातार स्पैम कॉल और फर्जी मैसेज
- दिनचर्या और लोकेशन पर निगरानी
इनमें से कई बातें
ज़्यादातर लोगों ने खुद झेली होंगी।
फिर भी हम इसे हल्के में ले लेते हैं —
जब तक हमारे साथ कुछ बड़ा न हो जाए।
यही लापरवाही असली समस्या है।
कुछ समय पहले पैन कार्ड को आधार से लिंक करने को लेकर
देशभर में अभियान चलाया गया।
इसी नाम का इस्तेमाल करके
हज़ारों लोगों को ठगा गया।
नासिक के एक किसान के बेटे को फोन आया।
कॉलर ने नाम लेकर बात की।
कहा गया कि पैन-आधार लिंक करने की समय सीमा खत्म हो रही है
और प्रक्रिया आसान बनाने के लिए
एक लिंक भेजा जाएगा।
कुछ ही सेकंड में एक मैसेज आया।
लिंक पर क्लिक किया गया।
मांगी गई जानकारी भरी गई।
और “ओके” दबा दिया गया।
थोड़ी देर बाद
एक और मैसेज आया —
अकाउंट से लाखों रुपये कट चुके थे।
बैंक गया।
अकाउंट फ्रीज़ हुआ।
थाने में FIR हुई।
महीने बीत गए।
न पैसे का पता,
न ठग का।
सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है:
उसे मेरा नाम,
मेरा नंबर,
मेरा बैंक बैलेंस
और पैन-आधार लिंक न होने की जानकारी
मिली कहाँ से?
यहीं पर ऑनलाइन प्राइवसी की असल सच्चाई सामने आती है।
समस्या सिर्फ़ ठगों की नहीं है।
समस्या यह है कि हमारा डेटा
कितनी आसानी से
कितने हाथों से होकर गुजर जाता है —
और हमें पता भी नहीं चलता।
भारत में ऑनलाइन प्राइवसी आज भी
ज्यादातर लोगों के लिए
कोई प्राथमिकता नहीं है।
जब तक नुकसान न हो,
तब तक सवाल नहीं उठते।
लेकिन डिजिटल भारत में
प्राइवसी को हल्के में लेना
अब महँगा साबित हो रहा है।
यह लेख डराने के लिए नहीं है।
यह याद दिलाने के लिए है कि
ऑनलाइन सुविधा के साथ
सतर्कता भी ज़रूरी है।
क्योंकि जब प्राइवसी चली जाती है,
तो नुकसान सिर्फ़ पैसे का नहीं होता —
भरोसे का भी होता है।




