नीले रंग का खून जिसमे लोह के जगह तांबा होता है – हीमोसायनिन

आपने इंसान और जानवर का खून देखा होगा। यह लाल रंग का होता है। लेकिन क्या आपने कभी इसबारे में सोचा है की ” क्या लाल के अलावा कोई और रंग का खून होता है ?

जी हां , लाल के अलावा नीले रंग का खून होता है। और यह समुदी जीवो पाया जाता है। और यह रंग उसे मिलता है हीमोसायनिन की वजह से। बिलकुल उसी तरह जिसतरह हमारा खून हीमोग्लोबिन की वजह से लाल होता है।

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हीमोसायनिन क्या है?

हीमोसायनिन एक प्रोटीन है जो घोंगो में पाया जाता है. जो ऑक्सीजन को उसी तरह से ले जाता है जैसे हीमोग्लोबिन मानव रक्त में ऑक्सीजन लेता है। इसी प्रकार हीमोग्लोबिन के लिए, एक केंद्रीय लोह धातु  ऑक्सीजन के अणु को बांधता है, और हीमोसायनिन में, यह केंद्रीय धातु तांबा होता है। यानी खून के अन्दर से ऑक्सीजन को शारीर में पहुचने का काम लोह के जगह खून में मौजूत तांबा करता है |

हीमोसायनिन वाला खून नीला क्यों होता है ?


अक्सरियत में जीवो के खून का आधार लाल रक्त पेशिया होती है और यह हिमोग्लोबिन से बनी हुई होती है. इसके विपरीत हेमोसाइनिन में रक्त पेशियों का आधार कॉपर यानी तांबा होने के वजह से नीला दिखाई पड़ता है. अधिकांश तौर पर घोंगे और आर्थ्रोपोड्स (संधिपाद) में हेमोसाइनिन होता है, जैसे कि समुद्री घोडा , केकड़ा और विशाल ऑक्टोपस।

नीले रंग के खून के जीव कोनसे है ?

स्तनधारियों के विपरीत, घोंघे, मकड़ियों और ऑक्टोपी हीमोग्लोबिन का उपयोग ऑक्सीजन के परिवहन के लिए नहीं करते हैं, लेकिन एक संबंधित यौगिक पर निर्भर करते हैं जिसे हेमोसायनिन कहा जाता है। इस अणु के बीच में लोहे का परमाणु होने के बजाय तांबे का एक परमाणु होता है जो ऑक्सीजन को बांधता है। हेमोसायनिन नीले रंग को छोड़कर सभी रंगों को अवशोषित कर लेता है, जिससे उनका रक्त नीला दिखाई देता है।

नीले रंग के खून का इस्तेमाल

घोड़े की नाल केकड़े का खून चमकीला नीला होता है। इसमें महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा कोशिकाएं होती हैं जो जहरीले बैक्टीरिया के प्रति असाधारण रूप से संवेदनशील होती हैं। जब वे कोशिकाएं हमलावर बैक्टीरिया से मिलती हैं, तो वे इसके चारों ओर थक्का जमा देती हैं और बाकी घोड़े की नाल केकड़े के शरीर को विषाक्त पदार्थों से बचाती हैं।

वैज्ञानिकों ने इन चतुर रक्त कोशिकाओं का उपयोग लिमुलस अमीबोसाइट लाइसेट, या एलएएल नामक एक परीक्षण विकसित करने के लिए किया, जो संदूषण के लिए नए टीकों की जाँच करता है। इस तकनीक का इस्तेमाल दुनिया भर में 1970 के दशक से किया जा रहा है ताकि चिकित्सा पेशेवरों को खराब बैक्टीरिया से भरे जाब्स देने से रोका जा सके जो इंसानों को बहुत बीमार कर सकते हैं।

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