पिछले कुछ सालों तक विदेश पढ़ाई का मतलब ज़्यादातर छात्रों के लिए एक ही था—अमेरिका।
लेकिन 2025–26 आते-आते तस्वीर साफ़ बदल रही है। आज का भारतीय छात्र अब आंख बंद करके यूएस का सपना नहीं देख रहा, बल्कि ज़्यादा सोचा-समझा फैसला ले रहा है।
वीज़ा रिजेक्शन, बढ़ती पढ़ाई की लागत और पढ़ाई के बाद नौकरी की अनिश्चितता ने छात्रों और उनके परिवारों दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। नतीजा? अब नज़र कनाडा, जर्मनी और आयरलैंड जैसे देशों पर टिक रही है।
कौन से देश बन रहे हैं नई पहली पसंद?
कनाडा अभी भी टॉप चॉइस बना हुआ है।
पोस्ट-स्टडी वर्क परमिट की सुविधा और पीआर (Permanent Residency) के साफ़ रास्तों की वजह से छात्रों को यहाँ भविष्य थोड़ा ज़्यादा सुरक्षित लगता है।
जर्मनी तेजी से पॉपुलर हो रहा है, खासकर उन छात्रों के बीच जो भारी फीस से बचना चाहते हैं।
फ्री या बहुत कम ट्यूशन फीस और मज़बूत जॉब मार्केट ने इसे एक प्रैक्टिकल ऑप्शन बना दिया है।
आयरलैंड आईटी और बिज़नेस स्टूडेंट्स के लिए खास आकर्षण बन चुका है।
यहाँ मिलने वाला 2-साल का पोस्ट-स्टडी वीज़ा छात्रों को पढ़ाई के बाद खुद को सेटल करने का अच्छा समय देता है।
अमेरिका से दूरी क्यों बढ़ रही है?
सिर्फ़ ट्रेंड नहीं, इसके पीछे ठोस वजहें हैं:
- F-1 वीज़ा रिजेक्शन अब काफी स्ट्रिक्ट हो चुका है। कुछ रिपोर्ट्स में रिजेक्शन रेट 40% के आसपास बताया जा रहा है, जिससे एप्लीकेशन्स में भारी गिरावट आई है।
- H-1B लॉटरी सिस्टम और जॉब फ्रीज़ ने पढ़ाई के बाद वर्क ऑप्शन को अनिश्चित बना दिया है।
- हाई ट्यूशन और लिविंग कॉस्ट—चार साल की पढ़ाई के बाद $90,000 या उससे ज़्यादा के कर्ज़ का डर अब रियल लगने लगा है।
- सेफ्टी और पॉलिटिकल माहौल को लेकर भी कई परिवार सहज महसूस नहीं कर रहे।
इन सबका असर सीधा स्टूडेंट डिसीज़न पर पड़ रहा है।
उभरते हुए नए विकल्प भी चर्चा में
कुछ और देश भी अब स्टूडेंट्स की लिस्ट में जगह बना रहे हैं:
- नीदरलैंड्स – इंग्लिश-टॉट प्रोग्राम्स और 1-साल का जॉब सर्च वीज़ा
- यूएई – इंडिया के पास, इंटरनेशनल कैंपस और ग्रोइंग अपॉर्च्युनिटीज़
- फ्रांस और न्यूज़ीलैंड – तुलनात्मक रूप से अफोर्डेबल, सेफ और स्टूडेंट-फ्रेंडली
आज का स्टूडेंट क्या सोच रहा है?
यह बदलाव दिखाता है कि भारतीय छात्र अब सिर्फ़ “ब्रांड नेम” नहीं देख रहा।
वह सवाल पूछ रहा है—
- कुल खर्च कितना होगा?
- वीज़ा प्रोसेस कितना आसान है?
- पढ़ाई के बाद नौकरी और सेटलमेंट का क्या स्कोप है?
यानी फैसला अब सपनों से ज़्यादा रियलिटी-चेक पर लिया जा रहा है।
और शायद यही सोच आने वाले सालों में भारतीय छात्रों की सबसे बड़ी ताकत बनने वाली है।









