भारत इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसे हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं, लेकिन उस पर रुककर सोचते कम हैं। यह दौर है—नौकरी के साथ-साथ साइड-हसल की होड़ का।
ऑफिस से लौटते हुए मेट्रो में कोई इंस्टाग्राम रील एडिट कर रहा है, कोई क्लाइंट को सोशल मीडिया पोस्ट भेज रहा है, तो कोई लैपटॉप खोलकर ट्रेडिंग चार्ट देख रहा है। 2026 का इंडियन युवा अब सिर्फ़ एक सैलरी पर भरोसा नहीं करता। वह चाहता है कि आमदनी एक नहीं, दो-तीन रास्तों से आए।
यही सोच आज उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ा तनाव भी।
साइड-हसल की भूख क्यों बढ़ती जा रही है?
सबसे बड़ा कारण है महँगाई। बड़े शहरों का किराया, ट्रांसपोर्ट, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थ खर्च—सब कुछ सैलरी से तेज़ भाग रहा है। ऐसे में “एक नौकरी काफी है” वाला भरोसा डगमगा जाता है।
दूसरी वजह है सोशल मीडिया का असर। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और लिंक्डइन पर हर दिन किसी न किसी की “सक्सेस स्टोरी” दिख जाती है—कोई फ्रीलांसिंग से कमाल कर रहा है, कोई कंटेंट बनाकर पैसे कमा रहा है, कोई ट्रेडिंग या ऑनलाइन बिज़नेस से। देखने वाले के मन में ख्याल आता है, “जब ये कर सकता है, तो मैं क्यों नहीं?”
और तीसरी वजह है डिजिटल सुविधा। लैपटॉप, इंटरनेट और रिमोट-वर्क ने खेल बदल दिया है। रात को घर बैठे फ्रीलांस प्रोजेक्ट मिल सकता है, ऑनलाइन कोर्स बेचे जा सकते हैं, ई-कॉमर्स या कंसल्टिंग शुरू की जा सकती है। काम अब सिर्फ़ ऑफिस की चार दीवारों तक सीमित नहीं रहा।
लेकिन इसकी असली कीमत क्या है?
दो-दो काम करने की यह दौड़ शरीर और दिमाग से धीरे-धीरे कीमत वसूलती है।
नींद कम होने लगती है, ब्रेक नाम की चीज़ लगभग गायब हो जाती है। दिमाग हर वक्त “अगला टास्क क्या है?” के मोड में रहता है।
सोशल मीडिया पर दूसरों की चमकती कामयाबी देखकर अपनी रफ्तार धीमी लगने लगती है। यहीं से शुरू होता है बेचैनी और FOMO—एक अजीब सा डर कि कहीं मैं पीछे तो नहीं रह गया।
सबसे चुपचाप जो नुकसान होता है, वह है रिश्तों का। परिवार के साथ बैठकर सुकून से बात करने का वक्त कम होता जा रहा है। दोस्तों से मिलने की जगह कॉल या मैसेज रह जाते हैं। कई बार रिश्तों में दूरी तब समझ आती है, जब काफी देर हो चुकी होती है।
साइड-हसल रखें, लेकिन दिमाग भी बचाएँ
साइड-हसल गलत नहीं है, लेकिन उसे संभालना ज़रूरी है।
सबसे पहले सीमाएँ तय करें—ऑफिस के बाद सिर्फ़ 2–3 घंटे ही साइड-हसल के लिए। उसके बाद स्क्रीन बंद। अगर यह लाइन नहीं खींची, तो बर्नआउट तय है।
दूसरा, वही काम चुनें जो आपकी स्किल और रुचि के करीब हो। सिर्फ़ जल्दी पैसे के लालच में ऐसा काम पकड़ लेना जो रोज़ आपको बोझ लगे, लंबे समय में नुकसान ही करेगा।
और हाँ, महीने में एक-दो दिन पूरी तरह ऑफ-स्क्रीन रहें। न क्लाइंट, न कंटेंट, न चार्ट—सिर्फ़ खुद के लिए और अपने लोगों के लिए। यही छोटे-छोटे ब्रेक आपको लंबे समय तक टिकाए रखेंगे।
2026 के युवा के सामने असली सवाल
आने वाले सालों में भारत में डिजिटल, फिनटेक, क्रिएटर इकॉनमी और गिग-वर्क और तेज़ होंगे। यानी साइड-हसल की हवा थमने वाली नहीं है।
असली सवाल यह नहीं है कि “एक से ज़्यादा कमाई कैसे करें?”, बल्कि यह है कि क्या हम सिर्फ़ ज़्यादा पैसे के लिए अपनी नींद, सेहत और रिश्तों की कुर्बानी देना चाहते हैं?
या फिर हम ऐसी ज़िंदगी बनाना चाहते हैं जहाँ पैसा भी हो और सुकून भी?
यही सवाल आज हर मिडिल-क्लास फ्लैट, पीजी रूम और हॉस्टल के कमरे में घूम रहा है। शायद इसी वजह से यह विषय आज की हिंदी इंटरनेट जेनरेशन के लिए इतना ज़्यादा सच्चा, इतना ज़्यादा अपना लगता है।









